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सोलो गेम या सीक्रेट डील ? बंगाल में कांग्रेस और वाम दलों का टूटा गठबंधन ; जानिए नए सियासी समीकरण
navbharattimes.indiatimes.com
Published about 4 hours ago

सोलो गेम या सीक्रेट डील ? बंगाल में कांग्रेस और वाम दलों का टूटा गठबंधन ; जानिए नए सियासी समीकरण

navbharattimes.indiatimes.com · Mar 1, 2026 · Collected from GDELT

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Published: 20260301T183000Z

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सोलो गेम या सीक्रेट डील? बंगाल में कांग्रेस और वाम दलों का टूटा गठबंधन; जानिए नए सियासी समीकरणEdited by: अभिषेक पाण्डेय|टाइम्स न्यूज नेटवर्क•1 Mar 2026, 11:28 pm ISTनई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले इस महीने की शुरुआत में कांग्रेस और वामपंथी दलों का गठबंधन टूट गया है। इससे बंगाल की राजनीति में नए सियासी समीकरण बन रहे हैं। वर्तमान में पश्चिम बंगाल में मुख्य मुकाबला ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच माना जा रहा है।लेकिन इन सबके बीच सबसे अहम सवाल ये है कि कांग्रेस को अकेले चुनाव लड़ने के लिए किसने प्रेरित किया और इस विभाजन का पार्टी और उसके अब पूर्व सहयोगी दोनों के लिए क्या अर्थ है?कांग्रेस का एकला चलो दांव पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने बताया, केंद्रीय नेतृत्व का मानना है कि पार्टी के पास खोने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है, इसलिए स्वतंत्र रूप से मैदान में उतरना बेहतर रणनीति है। गठबंधन टूटने के बाद अब कांग्रेस अपनी वोट हिस्सेदारी मजबूत करने पर ध्यान देगी, न कि सीट बंटवारे की गणित पर। साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अब चुनाव में टीएमसी और बीजेपी का दबदबा रहेगा। उन्होंने कहा, वामपंथियों के साथ हमारा गठबंधन टूटने से बंगाल की राजनीति में त्रिकोणीय समीकरण की कोई गुंजाइश नहीं है।केंद्रीय नेतृत्व को लगता है कि पार्टी के पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा है, इसलिए हमें यह लड़ाई खुद ही लड़नी चाहिए।यह बात पश्चिम बंगाल कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कही राजनीतिक विश्लेषक पार्टी के मौजूदा राज्य नेतृत्व और उसके पूर्व नेतृत्व के बीच अंतर की ओर भी इशारा करते हैं। उनका कहना है कि मौजूदा पार्टी राज्य प्रमुख सुभंकर सरकार के अपेक्षाकृत सुलह भरे रवैये ने केंद्रीय नेतृत्व के लिए वामपंथी गठबंधन को समाप्त करना आसान बना दिया। पूर्व प्रमुख, पूर्व लोकसभा सांसद अधीर रंजन चौधरी, ममता बनर्जी के जाने-माने आलोचक थे और उन्होंने एक साझा प्रतिद्वंद्वी को सत्ता से हटाने के प्रयास में वामपंथियों से मतभेदों को दरकिनार कर दिया था।लेफ्ट की प्रतिक्रिया और उसका विकल्प गठबंधन टूटने के कुछ दिनों तक चुप्पी साधने के बाद, वामपंथी दलों ने सीपीआई (एम) के महासचिव एमए बेबी के माध्यम से कांग्रेस को जवाब दिया। सीपीएम महासचिव एमए बेबी ने कांग्रेस पर ‘सांप्रदायिक ताकतों’ के खिलाफ व्यापक एकता से दूर जाने का आरोप लगाया। वाम दलों का कहना है कि वे समान विचारधारा वाली पार्टियों के साथ सहयोग के पक्षधर हैं, लेकिन कांग्रेस का मौजूदा रुख अलगाववादी है। उन्होंने आगे कहा कि सांप्रदायिक ताकतों, विशेष रूप से बीजेपी के खिलाफ संघर्ष में, वामपंथी दल जहां भी संभव हो, कांग्रेस सहित समान विचारधारा वाले दलों के साथ गठबंधन का पक्षधर है।कांग्रेस के बाहर निकलने पर वामपंथी दलों पर क्या असर पड़ेगा?राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस और लेफ्ट के अलग होने से विपक्षी वोट बंट सकते हैं, जिसका फायदा टीएमसी को मिल सकता है। हालांकि जमीनी स्तर पर किसी तरह की अनौपचारिक समझ की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा। दोनों दलों से बंटे हुए इन वोटों का सीधा फायदा टीएमसी को होगा।केरल फैक्टर भी अहम दिलचस्प बात यह है कि केरल में कांग्रेस और लेफ्ट सीधे प्रतिद्वंद्वी हैं और वहां भी चुनाव करीब हैं। ऐसे में बंगाल में अलग लड़ना दोनों दलों को केरल में असहज सवालों से बचा सकता है। गठबंधन के टूटने में केरल फैक्टर इसलिए भी अहम है, क्योंकि 2021 में वामपंथी दल ने केरल में लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल की, जिससे हर पांच साल में वामपंथी और कांग्रेस के बीच सत्ता के बारी-बारी से बदलने का पुराना सिलसिला टूट गया था। एक दशक के वामपंथी शासन के बाद सत्ता विरोधी लहर की आशंका को देखते हुए, कांग्रेस का मानना है कि उसके पास सत्ता में वापसी करने का एक वास्तविक अवसर है। हालांकि पश्चिम बंगाल में हो सकता है दोनों पार्टियां प्रत्यक्ष तौर पर एक-दूसरे पर हमला करने से बचे।आंकड़े क्या कहते हैं?यह पहली बार नहीं है, जब कांग्रेस और वामपंथी दल अलग हुए हैं। लोकसभा चुनाव से पहले मार्च 2019 में वे अलग हो गए थे। दिसंबर 2020 में, राज्य में मार्च-अप्रैल 2021 में विधानसभा चुनाव होने से कुछ महीने पहले, वे फिर से एक साथ आए और अब एक बार फिर अलग हो गए हैं। 2016 में कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन को कुछ सफलता मिली थी, लेकिन 2021 में यह सिमटकर महज दो सीटों तक रह गया। इससे साफ है कि गठबंधन को अपेक्षित चुनावी फायदा नहीं मिला।आगे की क्या है राह?राजनीतिक विश्लेषक कांग्रेस का यह फैसला साहसी लेकिन जोखिम भरा मान रहे हैं। उनका मानना है कि पार्टी भले सीटें ज्यादा न जीत पाए, लेकिन वह खुद को तीसरी ताकत के रूप में स्थापित करने की कोशिश करेगी। इससे भले ही ज्यादा सीटें न मिलें, लेकिन इसका असर पार्टी के कुल वोट शेयर पर जरूर पड़ेगा। दूसरी ओर, पार्टी के हाशिये पर धकेल दिए जाने का भी वास्तविक खतरा है। आने वाले चुनाव यह तय करेंगे कि क्या ये दोनों पूर्व प्रमुख दल अपनी प्रासंगिकता बचा पाएंगे या और हाशिए पर चले जाएंगे।Indiaकी ताजा खबरें, ब्रेकिंग न्यूज, अनकही और सच्ची कहानियां, सिर्फ खबरें नहीं उसका विश्लेषण भी। इन सब की जानकारी, सबसे पहले और सबसे सटीक हिंदी में देश के सबसे लोकप्रिय, सबसे भरोसेमंद Hindi Newsडिजिटल प्लेटफ़ॉर्म नवभारत टाइम्स पर


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