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Bangladesh , मां के नक्शेकदम पर चलकर भारत से दुश्मनी तो नहीं चुनेंगे बांग्लादेश के नए PM ? जानें - bangladeshs new pm follow in his mothers footsteps and choose to be hostile to india - India News
navbharattimes.indiatimes.com
Published 4 days ago

Bangladesh , मां के नक्शेकदम पर चलकर भारत से दुश्मनी तो नहीं चुनेंगे बांग्लादेश के नए PM ? जानें - bangladeshs new pm follow in his mothers footsteps and choose to be hostile to india - India News

navbharattimes.indiatimes.com · Feb 18, 2026 · Collected from GDELT

Summary

Published: 20260218T120000Z

Full Article

Edited by: अक्षय श्रीवास्तव|नवभारत टाइम्स•18 Feb 2026, 3:05 pm ISTबांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री का भारत को लेकर क्या रुख रहता है, यह देखना होगालेखक: हर्ष वर्धन श्रृंगला बांग्लादेश में हाल में हुए चुनावों ने दक्षिण एशिया की राजनीति में नया मोड़ ला दिया है। इससे वहां राजनीतिक पुनर्निर्माण का मौका बना है। साथ ही, भारत-बांग्लादेश संबंधों की भी नई शुरुआत हो सकती है। लंबे समय तक राजनीतिक अनिश्चितता और अंतरिम सरकार के कठिन दौर के बाद अब वहां निर्वाचित सरकार आई है। इससे संस्थागत स्थिरता बहाल होने और क्षेत्रीय विश्वास को मजबूती मिलने की उम्मीद है। बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी (BNP) को चुनाव में स्पष्ट जनादेश मिला है। इस परिणाम के पीछे एक अहम कारण अवामी लीग को चुनावी प्रक्रिया से बाहर रखा जाना भी रहा।अतीत की यादमहत्वपूर्ण बात यह है कि चुनावों से पहले BNP नेता तारिक रहमान ने भारत को लेकर सकारात्मक संदेश दिया। BNP को पता है कि बांग्लादेश की प्रगति भारत के साथ रचनात्मक संबंधों से जुड़ी है। लेकिन, हमारे सामने इस पार्टी के पिछले शासन की भी यादें हैं, जो अच्छी नहीं रहीं। 2001 से 2006 के शासनकाल में तारिक की मां खालिदा जिया के नेतृत्व में BNP ने भारत विरोधी काम किए थे। हालांकि यह मान लेना सही नहीं कि अतीत अपने को दोहराएगा। मौजूदा हालात को देखते हुए रिश्ता नई दिशा में बढ़ सकता है।मुश्किल में बांग्लादेशसाल 2000 के शुरुआती दौर के बाद से दक्षिण एशिया की आर्थिक और भू-राजनीतिक तस्वीर काफी बदल चुकी है। भारत इस क्षेत्र की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनकर उभरा है। वह वैश्विक सप्लाई चेन से गहराई से जुड़ा हुआ है और पड़ोसी देशों के लिए विकास के बड़े इंजन के रूप में देखा जा रहा है। दूसरी ओर, बांग्लादेश खुद आर्थिक दबाव में है। उसका बाहरी कर्ज 100 अरब डॉलर से ज्यादा हो चुका है। विदेशी मुद्रा भंडार पिछले चार साल में लगभग आधा रह गया है। ऐसे में बांग्लादेश के लिए क्षेत्रीय सहयोग बेहद जरूरी है।चेतावनी के संकेतबांग्लादेश की स्थिरता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि क्या BNP सिर्फ अपनी चुनावी जीत पर भरोसा करने के बजाय 1971 के मुक्ति संग्राम की भावना को साथ लेकर एक बड़ा और व्यापक गठबंधन बना पाती है। इस चुनाव में जमात ने भी अभी तक का सबसे शानदार प्रदर्शन किया है। इस गठबंधन से नैशनल सिटीजन पार्टी (NCP) भी जुड़ी थी। यह पार्टी जुलाई 2024 के आंदोलन से निकली है। हालांकि इसने उम्मीदों के मुताबिक प्रदर्शन नहीं किया, लेकिन युवा राजनीति का चरमपंथ की ओर झुकाव एक चेतावनी का संकेत है।फैसलों पर नजरआने वाले महीनों में यह साफ होगा कि क्या BNP ऐसी नीति बना पाती है, जो वैचारिक दबावों और आर्थिक जरूरतों के बीच संतुलन बना सके। चुनाव प्रचार के दौरान तारिक रहमान ने भारत को लेकर सकारात्मक भाषा का इस्तेमाल किया, लेकिन उनकी असली परख नीतिगत फैसलों से होगी।घरेलू जरूरतबांग्लादेश की आर्थिक महत्वाकांक्षाएं-जैसे निवेशकों का भरोसा वापस लाना, अर्थव्यवस्था को स्थिर करना और बेरोजगारी से निपटना, सीधे तौर पर रीजनल कनेक्टिविटी और व्यापार से जुड़ी हैं। दक्षिण एशिया में भारत की बढ़ती आर्थिक भूमिका ऐसे मौके देती है, जिनका फायदा बांग्लादेशी नेतृत्व उठा सकता है। इससे नई सरकार को जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने में मदद मिल सकती है। इस तरह देखा जाए तो भारत के साथ करीबी सहयोग केवल कूटनीतिक लक्ष्य नहीं, घरेलू राजनीति को मजबूत करने का साधन भी बन सकता है।भारत की नीतिबांग्लादेश को लेकर भारत की नीति आमतौर पर जल्दबाजी में नहीं बदलती, वह स्थिरता और लंबे समय के हितों पर ध्यान देती है। दोनों देशों की सीमा आपस में गहराई से जुड़ी हुई है। दोनों के बीच व्यापार, आर्थिक रिश्ते और सुरक्षा से जुड़े मुद्दे साझा हैं। यही भारत की नीतियों का आधार रहे हैं। अब जब रिश्ते नए दौर में प्रवेश कर रहे हैं, तो सीमा-पार सुरक्षा, कट्टरपंथ रोकने के प्रयास और रीजनल कनेक्टिविटी आगे भी अहम रहेंगे।सावधानी जरूरीबांग्लादेश को किसी भी हालत में पाकिस्तान की भारत के खिलाफ किसी साजिश का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। इसी तरह, बांग्लादेश के अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा दोनों देशों के रिश्तों पर असर डालती है। अगर बांग्लादेश की नई सरकार भारत की सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं पर ध्यान देती है, तो नई दिल्ली को भी उसी भावना के साथ सहयोग बढ़ाना चाहिए। इस चुनाव का महत्व केवल जीत के बड़े अंतर में नहीं, उसके बाद लिए जाने वाले राजनीतिक फैसलों में छिपा है। बांग्लादेश ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां सरकार के निर्णय तय करेंगे कि यह राजनीतिक बदलाव देश को नई स्थिरता की ओर ले जाएगा या फिर एक बार बिखराव की स्थिति पैदा करेगा।(लेखक सांसद और पूर्व विदेश सचिव हैं)लेखक के बारे मेंअक्षय श्रीवास्तवअक्षय श्रीवास्तव, नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में प्रिंसिपल डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर हैं। उन्हें 12 साल से ज्यादा की पत्रकारिता का अनुभव है। मार्च 2025 से वह NBT डिजिटल के साथ जुड़कर काम कर रहे हैं। एनबीटी न्यूज टीम में वह देश की खबरों पर नजर रखते हैं। वह राजनीति, अपराध, भारत की विदेश नीति और दिल्ली-एनसीआर से संबंधित मुद्दों को कवर करते हैं। वह ग्राउंड रिपोर्ट और एक्सक्लूसिव स्टोरीज की विशेषज्ञता रखते हैं। एनबीटी में स्पेशल न्यूज पैकेज 'मॉर्निंग न्यूज ब्रीफ' की भी जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं। उन्होंने तीन लोकसभा चुनावों (2014, 2019 और 2024)को कवर किया है । 2023 में दिल्ली की सड़कों पर कान का मैल निकालने के नाम पर फर्जीवाड़ा करने वाले कनमैलियों की धोखेबाजी को वो उजागर कर चुके हैं। भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विषय पर बैचलर और मास्टर्स की डिग्री हासिल की है।... और पढ़ेंIndiaकी ताजा खबरें, ब्रेकिंग न्यूज, अनकही और सच्ची कहानियां, सिर्फ खबरें नहीं उसका विश्लेषण भी। इन सब की जानकारी, सबसे पहले और सबसे सटीक हिंदी में देश के सबसे लोकप्रिय, सबसे 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