navbharattimes.indiatimes.com · Feb 21, 2026 · Collected from GDELT
Published: 20260221T054500Z
दलित-पिछड़ों की राजनीति करने वाले अब 'ब्राह्मण' जाप क्यों कर रहे?पटना: वैसे तो AI का जमाना है। सबके सिर पर एआई का भूत सवार है। स्टूडेंट भी सॉफ्टवेयर, मैकेनिकल और दूसरे सेक्टर से ज्यादा एआई इंजीनियरिंग की ओर फोकस कर रहे हैं। मगर, सियासत में एक ही इंजीनियरिंग है और वो है 'सोशल इंजीनियरिंग'। जो इसका मास्टर है, सत्ता की चाबी उसी के पास। पहले के दौर में दलित और पिछड़ा वर्ग चर्चा में रहता था। उनके हितों को साधन में सरकारें दुबली होती रहती थीं। लेकिन, हालिया राजनीति को देखें तो तकरीबन पूरे देश में ब्राह्मणों से जुड़े मुद्दे पर बहस होती है। दलित-पिछड़ों की राजनीति करने वाले भी ब्राह्मणों की बात की करने लगे हैं। उनकी चिंता में दुबले होते जा रहे हैं। कुल मिलाकर आजकल देश की राजनीति का 'हॉटकेक' ब्राह्मण बने हुए हैं, चाहे उसका समर्थन करे या विरोध। उनकी बातों में कहीं न कहीं से 'ब्राह्मण' आना तय है। यूपी में ब्राह्मण वोट इतना अहम क्यों? उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव है। PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) की पॉलिटिक्स करने वाले अखिलेश यादव को भी ब्राह्मणों को चिंता समय-समय पर सताते रहती है। मायावती तो ब्राह्मण वोट की बदौलत सत्ता की शिखर तक पहुंच चुकी हैं। फिर उस वोट बैंक पर बीजेपी ने कब्जा कर लिया। अब ब्राह्मण वोट के लिए अखिलेश यादव की छटपटाहट बढ़ते जा रही है। माता प्रसाद पाण्डेय को सदन में नेता प्रतिपक्ष बना रखा है। समय-समय पर ब्राह्मण समाज के समर्थन में बयान भी देते हैं। सियासी सरगर्मी बता रही है कि ब्राह्मण आज राजनीति के असली 'हॉटकेक' हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी अपनी छवि बदलने के लिए पुरजोर कोशिश कर रही है। माना जाता है कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी लगभग 11 से 13% है। सवर्णों में सबसे बड़ी आबादी ब्राह्मणों की है। राज्य की 100 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर वे निर्णायक भूमिका निभाते हैं। मतलब, यूपी में जिसे ब्राह्मणों ने चाहा उसकी सरकार पक्की।'ब्राह्मणवादी मानसिकता' शब्द पर बवालअब बात जातिवाद की लैबोरेट्री कहे जाने वाले राज्य बिहार की। 'ब्राह्मण' को लेकर बात बिहार विधानसभा से उठी। दरअसल, पटना से सटे पालीगंज के सीपीआईएमएल विधायक संदीप सौरभ में यूजीसी इक्विटी एक्ट से जुड़े सवाल बिहार विधानसभा में पूछा। उनके सवाल का मजमून था कि बिहार सरकार सदन से एक प्रस्ताव पास कर केंद्र सरकार को भेजे, जिसमें ऑर्डिनेंस लाकर नया कानून लागू करने की मांग हो। इसी दौरान उन्होंने 'ब्राह्मणवादी मानसिकता' शब्द का इस्तेमाल किया। सवाल खत्म होते ही स्पीकर प्रेम कुमार ने कहा कि प्रोसिडिंग से 'ब्राह्मण' शब्द को हटा दिया जाए। इसके बाद सदन में मौजूद विपक्षी (महागठबंधन) विधायकों ने शोर मचाना शुरू कर दिया। फिर सत्ता पक्ष (एनडीए) के विधायक भी खड़े होकर अपनी बात रखने लगे। 'मुझे हॉस्टल से बाहर निकलना पड़ा'सदन में शोर मची तो सरकार की ओर से डिप्टी सीएम विजय सिन्हा खड़े हुए और पिछली सरकारों (लालू-राबड़ी सरकार) में उनके साथ हुई आपबीती को सुनाया। उन्होंने बताया उनको भूमिहार ब्राह्मण समाज से होने की वजह से किस तरह की फजीहत झेलनी पड़ी थी। इसके बाद सदन एक बार फिर हंगामे की शोर में डूब गया। उन्होंने कहा, 'मैं भी टक्निकल कॉलेज में पढ़ने गया था, उस समय सत्ता किसकी थी? मैं भूमिहार ब्राह्मण समाज से आता हूं। मुजफ्फरपुर में रैगिंग कराया गया। हॉस्टल से बाहर निकलने के लिए विवश किया गया। मानसिकता पर प्रश्न चिन्ह उठना चाहिए। जातिगत भेदभाव से बाबा भीम राव के जातिविहीन समाज की मानसिकता को तार-तार करने की मानसिकता रखने वाले लोग राष्ट्र के हितैषी नहीं है।'बिहार के सदन में 'ब्राह्मण विवाद'आखिरकार, विपक्ष की ओर से आरजेडी विधायक को 'ब्राह्मण विवाद' पर सफाई देने का मौका मिला। फिर आलोक मेहता ने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि माननीय सदस्य (सीपीआईएमएल विधायक संदीप सौरभ) ने किसी जाति का नाम नहीं लिया है। ब्राह्मणवाद कहा गया, 'ब्राह्मणवाद कोई जाति नहीं है। जहां तक जाति की बात है, पिछड़ा वर्ग, दलित वर्ग और अतिपिछड़ा वर्ग की बात कही जा रही है। किसी जाति विशेष की बात नहीं कही जा रही है। इस तरह के बातों का प्रयोग कर के ऐसा लगता है कि चोर की दाढ़ी में तिनका है। जो गलत किए हैं, उनको तीता लग रहा है। मिर्ची लग जा रही है।' दरअसल, बिहार की करीब 40 विधानसभा सीटों पर ब्राह्मणों का दबदबा है। सरकार बनानी है तो इसे आप किसी भी सूरत में नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं।'ब्राह्मणवाद नहीं, इनको ब्राह्मणों से दिक्कत'बिहार विधानसभा में 'ब्राह्मण बहस' का मुद्दा जब जोर पड़ने लगा तो बीजेपी विधायक मिथिलेश तिवारी खड़े हुए। उन्होंने कहा, 'ये कोई ब्राह्मणवाद समझता नहीं है। लेकिन, इनको तकलीफ है ब्राह्मणों से। जिस ब्राह्मण का पांव पखारने तीनों लोकों के स्वामी भगवान कृष्ण एक गरीब ब्राह्मण का पांव अपने आंसुओं से धोते हैं, जिस ब्राह्मण के बिना न शादी होती है न श्राद्ध होता है, जिस ब्राह्मण ने भिक्षा मांगकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय बना दिया, जहां पर आज करोड़ों छात्र पढ़ते हैं। और अब ब्राह्मण इनको खराब लगता है।'क्या बिन ब्राह्मण नहीं मिलेगी कुर्सी?दरअसल, ये बात केवल एक जाति की नहीं है, बल्कि उस 'ओपिनियन मेकर' क्लास की है, जो चुनाव का माहौल बनाने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि तमाम क्षेत्रीय दल अब इस परंपरागत बीजेपी समर्थक माने जाने वाले वर्ग में सेंधमारी की कोशिश कर रहे हैं। ब्राह्मणों को 'साइलेंट वोटर' और 'ट्रेंड सेटर' माना जाता है। अगर वे किसी दल की ओर झुकते हैं, तो एक बड़ा संदेश समाज के अन्य वर्गों में भी जाता है। साथ ही उनको लेकर राजनीतिक दलों का अनुभव एक 'लॉयल वोटर' के तौर पर भी रहा है। ऐसे में बिहार हो या उत्तर प्रदेश या फिर मध्य प्रदेश हो या राजस्थान, कुर्सी की चाहत रखने वाले ब्राह्मणों से बैर मोल लेना नहीं चाहते हैं। अखिलेश यादव भरोसा दिलाने में जुटे हैं कि समाजवादी पार्टी की सरकार आने पर ब्राह्मणों के सम्मान की रक्षा की जाएगी। उन्होंने शहरों में परशुराम की मूर्तियां लगवाईं और 'प्रबुद्ध सम्मेलन' के जरिए ये संदेश दिया कि सपा अब केवल 'एम-वाई' (मुस्लिम-यादव) तक सीमित नहीं है। ब्राह्मण वोट बैंक को लेकर बेताबी क्यों?बिहार में भी यूपी से हालात कुछ जुदा नहीं है। बिहार में हालिया जातीय गणना ने राजनीतिक समीकरणों को नई हवा दी है। कास्ट सर्वे में ब्राह्मणों की आबादी लगभग 3.66% है। ऐसे में इस वोट बैंक को बिहार की एनडीए सरकार नजरअंदाज नहीं कर सकती। पालीगंज के सीपीआईएमएल विधायक संदीप सौरभ जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) प्रोडक्ट हैं। उनको लगा होगा कि जैसे वो दिल्ली की सड़कों पर 'ब्राह्मणवाद' के खिलाफ नारे लगाकर स्टूडेंट पॉलिटिक्स करते थे, उसी तरह बिहार विधानसभा में कर लेंगे। मगर, सड़क पर नारेबाजी करना और वोट पॉलिटिक्स करना दोनों अलग-अलग चीजें हैं। चुनावी राजनीति में बड़बोलापन कभी अच्छा नहीं माना जाता है, खासकर जब वो किसी समाज के संदर्भ में हो। यही वजह रही कि संदीप सौरभ की सफाई में आरजेडी की ओर से सीनियर नेता आलोक मेहता को मोर्चा संभालना पड़ा। फिर लगे 'ब्राह्मणवाद' और 'ब्राह्मण' पर सफाई देने। आजादी के शुरुआती दशकों में कांग्रेस की मजबूती का मुख्य स्तंभ ब्राह्मण-दलित-मुस्लिम गठबंधन ही था। आज उसी पुराने रसूख को फिर से हासिल करने के लिए क्षेत्रीय दल बेताब हैं। जिसकी बानगी तकरीबन पूरे देश में देखने को मिल रही है।लेखक के बारे मेंसुनील पाण्डेयसुनील पाण्डेय, नवभारत टाइम्स बिहार-झारखंड के सीनियर जर्निलिस्ट हैं। प्रिंट, टीवी और डिजिटल तीनों विधाओं का अनुभव रखते हैं। राजनीति, खेल, बिजनेस और ग्राउंड रिपोर्टिंग में 20 साल का तजुर्बा हैं। प्रतिष्ठित पाक्षिक पत्रिका माया और लोकायत से इन्होंने करियर की शुरुआत की। ईटीवी न्यूज़, महुआ न्यूज़ और ज़ी बिहार-झारखंड में लंबे समय तक कुशलता से अपनी जिम्मेदारी निभाई। न्यूज 18 बिहार-झारखंड में असिस्टेंट न्यूज एडिटर रहते हुए चैनल को नई दिशा दी। ग्राउंड और रिसर्च स्टोरी की रिपोर्टिंग/एडिटिंग में माहिर माने जाते हैं। राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर खासी पकड़ रखते हैं। कई अवॉर्ड से सम्मानित सुनील पाण्डेय को डिजिटल माध्यम में दिलचस्पी और सीखने की प्रबल इच्छा इन्हें नवभारत टाइम्स तक खींच लाई। मीडिया के नए प्रयोगों में दिलचस्पी के साथ सीखने की सतत चाहत रखते हैं। जनवरी 2021 से NBT में कार्यरत हैं। इन्होंने प्रतिष्ठित संस्थान पटना विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता की पढ़ाई की है।... और पढ़ें