
bhaskar.com · Feb 27, 2026 · Collected from GDELT
Published: 20260227T013000Z
राजस्थान सहित पूरे देश में एक्सट्रीम वेदर बड़ी चुनौती बन गया है। एक्सट्रीम वेदर का मतलब है खराब मौसम। हीटवेव, कोल्ड वेव, बिजली गिरना, तूफान, चक्रवात, बादल फटना, बाढ़, भूस्खलन…ये सभी एक्सट्रीम वेदर का ही नतीजा है।.राजस्थान की बात करें तो पिछले चार साल में 2023 को छोड़कर हर साल 100 से ज्यादा दिन एक्सट्रीम वेदर के थे। खराब मौसम ने हर साल 100 से ज्यादा लोगों की जान ली।ये खुलासा हुआ है सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) और उसकी पत्रिका डाउन टू अर्थ की वर्ष 2026 की ‘स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट’ रिपोर्ट में। रिपोर्टर में देश और खासतौर पर राजस्थान के लिए गंभीर चेतावनी जारी की है।पढ़िए पूरी रिपोर्ट…99% दिन एक्सट्रीम वेदर इवेंट: देश और राजस्थान दोनों अलर्ट पररिपोर्ट के अनुसार, जनवरी से नवंबर 2025 के बीच देश में 334 में से 331 दिनों में किसी न किसी रूप में एक्सट्रीम वेदर था। इन घटनाओं में हीटवेव, कोल्ड वेव, बिजली गिरना, तूफान, चक्रवात, क्लाउडबर्स्ट, भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन शामिल हैं।राजस्थान–महाराष्ट्र में फरवरी में हीटवेवसबसे चिंताजनक बदलाव हीटवेव के स्वरूप में दिखा। भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, राजस्थान और महाराष्ट्र में फरवरी में ही लू दर्ज की गई। सर्दियों के दौरान लू का यह पहला रिकॉर्ड है।वहीं, शीतलहर अब केवल सीमित भौगोलिक क्षेत्र की घटना नहीं रही। 2025 में यह 13 राज्यों तक फैल गई। राजस्थान जिस नार्थ वेस्ट रीजन का हिस्सा है, वहां 334 में से 311 दिन एक्सट्रीम वेदर रहा।इस रीजन में दिल्ली, हरियाणा,हिमाचल प्रदेश सहित 9 राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश आते हैं।तस्वीरें मई 2024 की हैं। हीटवेव से कई लोगों की तबीयत इतनी बिगड़ गई कि ठंडे पानी और बर्फ का इस्तेमाल करना पड़ा।1.5 डिग्री बढ़ जाएगा दुनिया का तापमानरिपोर्ट का विमोचन राजस्थान के नीमली (खैरथल-तिजारा) में हुए अनिल अग्रवाल डायलॉग 2026 के दौरान किया गया। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश दीपक गुप्ता, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के पूर्व सचिव अशोक लवासा और सीएसई की महानिदेशक सुनिता नारायण ने संयुक्त रूप से रिपोर्ट जारी की।इस दौरान नारायण ने कहा- जलवायु संकट एक ऐसे बिंदु पर पहुंच रहा है, जहां से वापस लौटना असंभव है। यदि हम पिछले तीन वर्षों का औसत लें तो दुनिया का तापमान पहली बार 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाएगा। यह एक संकेत है कि हम सुरक्षा सीमा को पार कर रहे हैं।हर बार मानसून में कई शहरों में इसी तरह बाढ़ के हालात बन जाते हैं।सर्दियों में पारा जमाव बिंदु से 5 डिग्री तक नीचे चला जाता है। खेतों में और तारबंदी पर बर्फ जम जाती है।हम लागत बचाना चाहते हैं या एक पूरी प्रजातिपश्चिमी राजस्थान में सोलर एनर्जी कॉरिडोर तेजी से फैल रहा है। हजारों मेगावाट क्षमता के प्रोजेक्ट्स थार क्षेत्र में स्थापित हो रहे हैं। इसी क्षेत्र में गोडावण का अंतिम प्रमुख आवास भी है।सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज दीपक गुप्ता के अनुसार हाई-टेंशन बिजली लाइनों से टकराने के कारण गोडावण की मौतें बढ़ी हैं। राज्य में अब इनकी संख्या बेहद सीमित रह गई है।बिजली लाइनों को अंडरग्राउंड करने का मुद्दा भी सालों से चर्चा में है। उद्योग जगत का तर्क है कि यह प्रक्रिया महंगी है। जस्टिस गुप्ता ने इस पर कहा कि तय करना होगा कि हम लागत बचाना चाहते हैं या एक प्रजाति।रिपोर्ट में क्लाइमेट चेंज को लेकर दी गई जानकारी काफी चौंकाने वाली हैं।अदालतों और विशेषज्ञ रिपोर्ट पर सवालरिपोर्ट लॉन्चिंग के दौरान जस्टिस दीपक गुप्ता ने अदालतों में पेश की जाने वाली विशेषज्ञ रिपोट्र्स की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न उठाए। उन्होंने कहा कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल अच्छा प्रयोग था लेकिन सफल नहीं हो पाया।उनका कहना था कि कई बार व्यावसायिक हित राष्ट्रीय आर्थिक हितों पर हावी हो जाते हैं। उन्होंने संकेत दिया कि न्यायपालिका को पर्यावरणीय मामलों में अधिक संवेदनशील और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि देश में अधिकांश जज पर्यावरण के विशेषज्ञ नहीं होते, फिर भी उन्हें जटिल पारिस्थितिक मामलों पर निर्णय देने पड़ते हैं।उनके अनुसार, न्यायाधीशों को पर्यावरणीय मामलों पर विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि विकास और संरक्षण के बीच संतुलित निर्णय संभव हो सके।उन्होंने कहा संवेदना एक तो अपने आप आती है और दूसरी उसे विकसित किया जाता है। ट्रेनिंग देकर सिखाया जाता है। कार्यक्रम में वनतारा पर भी चर्चा हुई। उन्होंने कहा- मेरे अनुसार वनतारा में नियमों का पालन नहीं किया जाता।जू अथॉरिटी के नियमों का भी सही तरीके से अनुपालन नहीं हो रहा है, जो चिंताजनक है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे किसी व्यक्ति विशेष की नीयत पर सीधा आरोप नहीं लगा रहे हैं।जो व्यक्ति वनतारा चला रहे हैं, उनके इरादे अच्छे हो सकते हैं, लेकिन केवल इसलिए कि किसी के पास संसाधन हैं या कोई अमीर है, इसका अर्थ यह नहीं कि दुनिया की हर प्रजाति उनके चिड़ियाघर या रेस्क्यू सेंटर में पहुंचा दी जाए।राजस्थान के तिजारा के नीमली में हुए कार्यक्रम में संबोधित करते सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज दीपक गुप्ता।