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Bihar Heatwave Alert : Early Summer in March , May Heat in March
bhaskar.com
Published 1 day ago

Bihar Heatwave Alert : Early Summer in March , May Heat in March

bhaskar.com · Feb 21, 2026 · Collected from GDELT

Summary

Published: 20260221T013000Z

Full Article

ग्लोबल वार्मिंग और वेस्टर्न डिस्टरबेंस लंबा नहीं चलने से बिहार में गर्मी 10 दिन पहले आ गई है। फरवरी में ही मार्च जैसे मौसम का अहसास हो रहा है। होली के बाद मई वाली तपिश मार्च में ही होगी।.मौसम विभाग के मुताबिक, इस साल गर्मी 30 दिन ज्यादा पड़ेगी। लू वाले दिनों की संख्या अधिक होगी। हीटवेव का खतरा शहरों में ज्यादा, गांवों में कम होगा। फिलहाल, राज्य का औसत अधिकतम तापमान 29 डिग्री सेल्सियस के आसपास है।क्यों फरवरी में ही गर्मी आ गई है? बदलते मौसम से सेहत पर क्या असर पड़ रहा है? मानसून कैसा रहेगा? पढ़ें रिपोर्ट…।अभी से प्रीमेच्योर गर्मी के मिल रहे संकेतराज्य में 17 फरवरी को अधिकतम तापमान 31.3 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया। इसके बाद अधिकतम तापमान 26.6 डिग्री सेल्सियस से 31.3 के बीच रिकॉर्ड किया जा रहा है। यह प्रीमेच्योर गर्मी का संकेत है। पिछले साल 2025 में गया में तापमान 44 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया था।मौसम के रुझान बताते हैं कि इस बार भी पारा चढ़ेगा। मार्च में ही अप्रैल जैसी गर्मी महसूस हो सकती है। कुछ जिलों को छोड़ दें तो राज्य के ज्यादातर जिलों में अधिकतम तापमान 29-30 डिग्री के आसपास है। अगले दो तीन दिनों में पारा चढ़ने के आसार हैं।दिख रहा ग्लोबल वार्मिंग का असरमौसम में आए बदलाव को लेकर हमने पटना मौसम विज्ञान केंद्र के डायरेक्टर आनंद शंकर से बात की। उन्होंने कहा, ‘अगले दो सप्ताह के दौरान बारिश नहीं होगी। तापमान में एक-दो डिग्री का इजाफा हो सकता है। इस साल फरवरी में नॉर्मल से अधिक गर्मी है। यह 28 फरवरी तक ठीक से पता चल सकेगा कि मई-जून के समय कैसी गर्मी रहेगी। यह सब ग्लोबल वार्मिंग का असर है। पिछले वर्ष की तुलना में तापमान बढ़ने की आशंका है।’15 साल का ट्रेंड: समय से पहले जा रही है ठंडपिछले 15 वर्षों के तापमान पर नजर डालें तो बिहार का वार्षिक औसत सतही वायु तापमान लगभग 24 डिग्री सेल्सियस रहता है। मार्च 2025 में बिहार में गर्मी ने 15 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ दिया था। तापमान 36.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था।फरवरी 2026 में अधिकतम तापमान 31.3 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचा है। तापमान का 30 डिग्री से ऊपर होना साफ संकेत है कि ठंड जल्द जा रही है और गर्मी की शुरुआत पहले हो रही है। सुबह और शाम में थोड़ी ठंड महसूस हो रही है, लेकिन दिन में धूप और गर्मी ज्यादा है।अप्रैल-जून में हीटवेव, जल संकट का खतराभारतीय मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक, अप्रैल और जून माह के बीच तापमान सामान्य से ऊपर रहेगा। हीटवेव का समय बढ़ा हुआ रहेगा। पिछले साल जिस तरह की गर्मी और तापमान रहा, उससे साफ है कि बिहार के कई इलाकों में गर्मी के समय तापमान 40 डिग्री से ऊपर होने की आशंका है। पिछले कुछ सालों के ट्रेंड से भी यही अनुमान लगाया जा रहा है।हीटवेव (लू) वाले दिन बढ़ सकते हैं। इसका असर यह होगा कि लोगों की सेहत और कृषि दोनों प्रभावित होगी। पानी की जरूरत बढ़ेगी। जल संकट का खतरा होगा। दक्षिण बिहार के इलाकों में वाटर लेवल ज्यादा प्रभावित होगा।फेरिन्जाइटस वायरस बोल रहा हमलामौसम में हो रहे बदलाव के बीच फेरिन्जाइटस वायरस हमला बोल रहा है। इसके संक्रमण से गला बैठ जाता है। बुखार के साथ खांसी होती है। गले में संक्रमण होता है। डॉक्टरों के अनुसार अभी गर्म कपड़े पहनना नहीं छोड़ना चाहिए। सुबह और शाम के वक्त ज्यादा ध्यान रखना चाहिए।फ्लू, इन्फ्लूएंजा, ज्वाइंट पेन की शिकायत बढ़ेगीमौसम में आए बदलाव से सेहत पर क्या असर पड़ सकता है? इस सवाल को लेकर हमने सीनियर फिजिशियन डॉ. दिवाकर तेजस्वी से बात की। उन्होंने कहा, मौसम में तेजी से बदलाव यानी जल्द गर्मी आने पर फ्लू, वायरस, इंफ्लूएंजा, ज्वाइंट पेन आदि के पेशेंट बढ़ जाते हैं। ऐसा अभी दिख भी रहा है।’शहर में ज्यादा गर्मी, गांव में ठंडक, ऐसा क्यों?अगर आप पटना, मुजफ्फरपुर या किसी और शहर में रहते हैं और गांव जाते हैं तो एक बात साफ महसूस करते हैं। शहर में ज्यादा गर्मी है और गांव में ठंडक। इसके पीछे ये प्रमुख कारण हैं..कंक्रीटाइजेशन: घर हो या सड़क, शहर में हर तरफ कंक्रीट से बनी संरचनाएं दिखती हैं। इससे गर्मी दो तरह से बढ़ती है। कंक्रीट की इमारतें और सड़कें सूरज की गर्मी को अवशोषित करती हैं और रात में गर्मी को धीरे-धीरे वातावरण में छोड़ती हैं। इसके चलते रात में भी गर्मी बनी रहती है। जमीन के भीतर पानी कम होने से जमीन के ऊपर सूखापन बढ़ जाता है। इससे गर्मी ज्यादा फील होती है।हरियाली की कमी: शहरों में पेड़-पौधों की कमी होती है। पेड़-पौधों की पत्तियों से वाष्पोत्सर्जन होता है। इससे आसपास का इलाका ठंडा रहता है।मशीनों से निकलने वाली गर्मी: वाहनों और कारखानों से निकलने वाली गर्मी वातावरण को गर्म कर देती है। AC घर को तो ठंडा करती है, लेकिन बाहर गर्मी छोड़ती है। इसका असर पूरे शहर के क्लाइमेट पर पड़ता है।प्रदूषण: शहरों में ज्यादा प्रदूषण होता है। ग्रीनहाउस गैसों (CO2, ओजोन) का उत्सर्जन भी अधिक होता है। इनके चलते तापमान बढ़ता है।2026 में बिगड़ सकता है मानसून का मिजाज2026 में मानसून का मिजाज बिगड़ सकता है। समुद्र में हो रहे बदलाव बारिश का गणित गड़बड़ा सकते हैं। मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक संभावना है कि 2026 में बिहार को दोहरी मार झेलनी पड़े। उत्तर बिहार में ज्यादा बारिश से बाढ़ का खतरा है तो दक्षिण बिहार में कम बारिश से सूखे जैसे हालात बन सकते हैं।भारतीय मौसम विज्ञान विभाग और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के शुरुआती संकेत बताते हैं कि इस बार देश में बारिश बराबर नहीं बंटेगी। इसका असर बिहार जैसे संवेदनशील राज्य पर ज्यादा दिख सकता है।ला नीना की विदाई, हिंद महासागर तटस्थपुणे स्थित जलवायु अनुसंधान और सेवाएं प्रभाग के पूर्व प्रमुख डॉ. डीएस पई ने बताया कि मौजूदा ला नीना फरवरी से अप्रैल के बीच कमजोर होकर न्यूट्रल स्थिति में जा सकती है। मानसून की शुरुआत ऐसे तटस्थ हालात में होती है तो बारिश का बंटवारा असमान रहता है। कहीं बहुत ज्यादा तो कहीं बहुत कम बारिश होती है। हिंद महासागर भी अभी तटस्थ स्थिति में है।अगर यह सकारात्मक चरण में नहीं गया तो मानसून को ताकत नहीं मिलेगी। ला प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य रूप से ठंडक की एक प्राकृतिक घटना है। यह भारत में सामान्य से अधिक बारिश और सर्दियों में कड़ाके की ठंड लेकर आती है।बारिश के दिन घटे, कम दिनों में ज्यादा बारिश, इसलिए बाढ़-सूखा एक साथपटना मौसम केंद्र के निदेशक आशीष कुमार ने बताया कि बिहार में बारिश सामान्य के आसपास है, लेकिन बारिश के दिन घट गए हैं। कम दिनों में तेज बारिश हो रही है। इसी वजह से एक ही सीजन में बाढ़ और सूखे जैसे हालात बन रहे हैं।उन्होंने कहा, ‘आंकड़ों के अनुसार 2019 से 2021 के बीच अधिक वर्षा और बाढ़ की स्थिति रही। जबकि 2022 से 2025 तक कई जिलों में सामान्य से कम बारिश दर्ज हुई। उत्तर बिहार और नेपाल की तराई में भारी बारिश होती है। वहीं, गया, नवादा और औरंगाबाद जैसे दक्षिणी जिलों में पानी कम गिरता है। अब पूरी बारिश कम दिनों में सिमट रही है। जोखिम बढ़ गया है।’क्यों बिगड़ रहा है मानसून का खेल?तटस्थ समुद्र: प्रशांत महासागर में न ज्यादा ठंडक, न ज्यादा गर्मी। ऐसे में मानसून का रुख तय करना मुश्किल होता है।कम ताकत: हिंद महासागर से मिलने वाली अतिरिक्त ऊर्जा कम दिख रही है।तिब्बत का असर: अगर वहां ज्यादा ठंड रही, तो मानसूनी हवाएं धीमी पड़ सकती हैं।


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