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Warning Labels on Packaged Foods : पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर चेतावनी : जन स्वास्थ्य के लिए सर्वोच्च न्यायालय की सख्त पहल - warnings on packaged foods supreme court takes a strong stand for public health
hindi.business-standard.com
Published 6 days ago

Warning Labels on Packaged Foods : पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर चेतावनी : जन स्वास्थ्य के लिए सर्वोच्च न्यायालय की सख्त पहल - warnings on packaged foods supreme court takes a strong stand for public health

hindi.business-standard.com · Feb 16, 2026 · Collected from GDELT

Summary

Published: 20260216T213000Z

Full Article

गत सप्ताह सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) से उन पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर फ्रंट ऑफ पैक यानी पैकेट पर सामने की ओर चेतावनी लेबल लगाने पर गंभीरता से विचार करने को कहा, जो चीनी, संतृप्त वसा, ट्रांस वसा और सोडियम की अधिक मात्रा वाले हों। न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसे लेबल सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी लक्ष्यों को हासिल करने में मददगार हो सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर चार सप्ताह में जवाब मांगा है। यह बात नियामक के लिए खास है क्योंकि उसने वर्षों तक इस मुद्दे पर बहस तो की लेकिन मानदंडों को अंतिम रूप नहीं प्रदान किया। देश में मोटापे की समस्या चिंताजनक रूप से बढ़ रही है और अब वह एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की 2019-21 की रिपोर्ट बताती है कि 24 फीसदी महिलाएं और 23 फीसदी पुरुष अधिक वजन या मोटापे की समस्या से जूझ रहे हैं। पांच साल से कम उम्र के बच्चों में अतिरिक्त वजन साल 2015-16 के 2.1 फीसदी से बढ़कर 2019-21 में 3.4 फीसदी हो गया। वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस 2024 का अनुमान है कि साल 2020 में 3.3 करोड़ से अधिक भारतीय बच्चे मोटापे से ग्रस्त थे और यह संख्या 2035 तक बढ़कर 8.3 करोड़ तक हो सकती है। यह 15 साल में दोगुने से अधिक इजाफा है। इसके साथ-साथ ही भारत अति प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के लिए सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक बन चुका है। वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा में इस बात को रेखांकित किया गया है कि 2009 से 2023 के बीच ऐसे अत्यधिक प्रसंस्करण वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री में 150 फीसदी से अधिक इजाफा हुआ। यह मोटापे, डायबिटीज और अन्य कई बीमारियों की प्रमुख वजह है। लगभग इसी अवधि में मोटापा कम से कम दोगुना हो गया है और इनके आपसी संबंधों की अनदेखी करना मुश्किल है। वैश्विक साक्ष्यों का एक समूह, जिसमें लैंसेट की ऐसे खाद्य पदार्थों पर एक श्रृंखला भी शामिल है, ऐसे खाद्य पदार्थों की अधिक खपत को मोटापा, डायबिटीज, दिल की बीमारियों, श्वसन संबंधी बीमारियों और यहां तक कि मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से भी जोड़ता है। इसके निहितार्थ चिंताजनक हैं: बढ़ती स्वास्थ्य देखभाल लागत, उत्पादकता की हानि और लोक वित्त पर दीर्घकालिक दबाव। गैर संचारी रोगों पर नियंत्रण के लिए भारत की राष्ट्रीय बहुक्षेत्रीय कार्य योजना (2017) ने उच्च वसा, शक्कर और नमक की खपत को कम करने के लिए फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग (एफओपीएल) की सिफारिश की थी। वर्षों की परामर्श प्रक्रिया के बावजूद इससे संबंधित मानदंड अब तक तय नहीं हो पाए हैं। एफएसएसएआई ने उद्योग के विरोध और लेबलिंग मॉडलों पर बहस के बीच फ्रंट ऑफ पैक नियमों को अंतिम रूप देने में देरी की है। समस्या की एक वजह नियामकीय अस्पष्टता में भी निहित है। भ्रामक प्रचारों के विरुद्ध केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण के दिशानिर्देश और खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम दोनों बढ़ाचढ़ाकर किए गए स्वास्थ्य संबंधी दावों का निषेध करते हैं लेकिन इनमें पोषण की सीमा से संबंधित स्पष्टता की कमी है जिसके आधार पर यह तय किया जा सके कि खाद्य मार्केटिंग में कौन-सी बातें भ्रामक हैं कौन-सी नहीं। लेबलब्लाइंड सॉल्युशंस द्वारा किए गए एक स्वतंत्र अध्ययन ने पाया कि करीब एक तिहाई लेबलिंग दावे या तो अनुपालन से परे थे या फिर उनमें पर्याप्त नियामकीय प्रमाणन का अभाव था। चेतावनी देने वाले लेबल अधिक प्रत्यक्ष सुधारात्मक उपाय प्रदान करते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि सरल, व्याख्यात्मक चेतावनियां जैसे ‘अधिक शक्कर’ या ‘अधिक नमक’ अस्वास्थ्यकर विकल्पों को हतोत्साहित करने में रेटिंग जैसी प्रणाली और हेल्थ स्टार रेटिंग की तुलना में अधिक प्रभावी साबित होती हैं। चिली जैसे देश ने चेतावनी लेबलों को मार्केटिंग प्रतिबंधों के साथ जोड़ा है, विशेष रूप से बच्चों के लिए। इस प्रकार उसने एक एकीकृत सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचा तैयार किया है। ध्यान रहे कि लेबल कोई जादुई समाधान नहीं है। यह एक बहुआयामी रणनीति का हिस्सा जरूर हो सकता है। भ्रामक दावों की कड़ी निगरानी, उच्च वसा, शक्कर और नमक वाले उत्पादों पर पोषक तत्व आधारित कर लगाने की संभावना और डिजिटल मीडिया पर बच्चों को लक्षित करने वाले प्रचार पर प्रतिबंध लगाने की व्यवस्था होनी चाहिए। पोषण अभियान (पीएम पोषण शक्ति निर्माण), ईट राइट इंडिया और राष्ट्रव्यापी जागरुकता अभियानों जैसी सरकारी पहलें एक आधार प्रदान करती हैं। ऐसे बाजार में, जो अति प्रसंस्करण वाले विकल्पों और प्रभावशाली विज्ञापन से भरा हुआ है, राज्य को यह सुनिश्चित तो करना चाहिए कि उपभोक्ताओं को यह स्पष्ट चेतावनी मिले कि वे क्या खा रहे हैं। First Published - February 16, 2026 | 10:35 PM IST बिज़नेस स्टैंडर्ड चैनल फॉलो करें


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